मैं दिल्ली हूं...
मैं दिल्ली हूं... लोकतंत्र के सरताज हिदुस्तान का दिल... मैं लोकशाही की जीती-जागती मिसाल हूं... मैं गर्व करती हूं कि मेरे आंगन में लोकतंत्र का मंदिर स्थापित है... मेरे वैभव की कहानी युगों-युगों से गायी जाती रही है... कभी दिल्ली नाम से तो कभी इन्द्रप्रस्थ नाम से... मैं मानव सभ्यता के बदलाव की साक्षात् गवाह हूं...स्थिर रहकर भी मैने हर बदलती हवा का अहसास किया है... मैने अनगिनत दर्द भी सहे हैं लेकिन आज मेरा दर्द असहनीय है... ये दर्द है मेरे दामन पर लगे एसे दाग का जो समय के साथ गहराता जा रहा है... मेरे साये में पल रही अस्मिता आज खतरे में है... महिलायें... युवतियां यहां तक कि मासूम बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं... आज हर कोई मुझे हिकारत भरी नजरों से देख रहा है... एसा नहीं है कि मैं अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं कर सकती लेकिन यकीन मानिये आज मैं खुद को असहाय महसूस कर रही हूं... मैं समझ नहीं पा रही कि जिन कंधों पर मेरी इज्जत की रखवाली की जिम्मेदारी है... वे इतने कमजोर क्यों हो गये... क्यों वे आज उन वहशियों की तरफदारी करने लगे जो इंसान कहलाने लायक नहीं हैं... मैं तो उनके बल भरोसे आराम से सो जाती थी लेकिन आज मुझे नींद नहीं आ रही क्योंकि मेरा दागी दामन मेरे अंतस को झकझोर रहा है... मैं परेशान भी हूं और मायूस भी... क्या खाकी क्या खादी सब मेरा विश्वास तोड़ते नजर आ रहे हैं... कोई बयान दे रहा है... कोई कार्रवाई का भरोसा... मैं इनके बयान और आश्वासन पर यकीन कर भी लेती अगर ये पहली बार हुआ होता... मैं आपबीती कहूं भी तो किससे शायद सब गूंगे और बहरे हो चुके हैं ठीक किसी पत्थर की मानिंद... अब मुझे आसरा है तो सिर्फ देश के उन बेटी-बेटों का जिनके लिए मैं आज भी दिल्ली हूं
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