Tuesday, 2 July 2013

मै किसान...

किसान की आत्मकथा

मैं किसान! पैदा हुआ कीचड़ में, वहीं पला-बढ़ा और पढा़ भी वहीं।

लेकिन उतना ही पढ़ पाया जितना वहां पढ़ाया गया। बढा़यी और

पढ़ायी के उस दौर में एक बात सुनी-सीखी कि कमल पैदा तो कीचड़

में होता है, लेकिन इतना सुन्दर और अद्वितीय होता कि उसे राष्ट्रीय

पुष्प का दर्जा प्राप्त है। फिर क्या था मैं भी सोचने लगा ‘कमल’ जैसा

भविष्य बनाने की। रोज तड़के उठ जाता और लग जाता हाड़-तोड़

मेहनत में। गर्मी के मौसम में चोटी का पसीना एड़ी से होता हुआ खेत

में पहुंचता तो एक ही खयाल आता कि शायद यही होती है खून-पसीने

की कमाई जो दर्जा पांच में पढ़ी थी। लेकिन ये तो पसीने की ही कमाई

हुई, खून की कमाई क्या होती है? यह प्रश्न बार-बार मन में आता।

खैर, वह भी कभी समझ आ जायेगी, इतना सोचकर चिलचिलाती धूप

में भूसे का गट्ठर सिर पर रखकर घर आ जाता। रूखी-सूखी खाकर ठण्डा

पानी पीता और थोड़ी देर आराम के बाद फिर वहीं खेतों में पहंुच जाता।

सोचता था कि मैं इस देश का बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति हूं जो पूरे देश के

लिए अनाज के साथ-साथ चाय, चीनी और दूध पैदा करता हॅंू। लहलहाती

फसलों को देखकर मेरा सीना गर्व से चैड़ा हो जाता कि मेरा भी भविष्य

कमल की तरह उज्ज्वल होगा, राष्ट्रीय स्तर पर मेरा भी सम्मान होगा,

वगैरह-वगैरह। फिर एक दिन मैने सुना कि गांव के पास एक चैड़ी सड़क

बन रही है, और सरकार गांव के खेतों पर कब्जा कर रही है। सुनकर मेरा

कलेजा मुंह को आ गया, फिर अचानक मन में खयाल आया, एसा कैसे हो

सकता है, मैं इस देश का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ही नहीं अंग भी हूं। यह

सब अफवाह है। परन्तु कुछ दिन बाद मेरा खयाल और विश्वास चकनाचूर

हो गया। जैसे ही मैं खेत पर पहुंचा, बड़ी- बड़ी दैत्याकार मशीनें मेरी प्यारी

उपजाऊ मिट्टी, जिस पर कभी मैं अपने बैलों की घण्टियों की खनकती आवाज

सुना करता था, को गरज-गरज कर उठा कर फेंक रहीं हैं। मेरे होठ कांपने

लगे और आंखें डबडबा गयीं। अंगोछे को मुंह पर रखकर फफकी रोके हुए मैं

घर पहुंचा और बिलख-बिलख कर रो पड़ा। ये हाल सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि

मेरे जैसे हर किसान का था। अगले दिन गांव की चैपाल पर बैठक हुयी जिसमें

तय हुआ कि सरकार के पास चलकर मुआवजा मांगेंगे। आंखों में मुआवजे की

आस लिए किसानों के झुण्ड में मैं भी था, जिसका उज्ज्वल भविष्य का सपना

मेरे खेत की मिट्टी में ही दब गया था। सरकारी दफ्तर पहुंचे तो किसी ने सीधे

मुंह बात तक नहीं की, दुख-दर्द पूंछना तो दूर की बात थी। कुछ किसान उत्तेजित

हो गये और नारेबाजी पर उतर आये, लेकिन कीचड़ में पैदा हुये किसान की

औकात कीचड़ के कीडे़ से ज्यादा कुछ नहीं आंकी गयी। दफ्तर की सुरक्षा के

लिए खड़े खाकी वर्दी पहने वे योद्धा जो आमतौर पर अपनी सुस्ती और लापरवाही

के लिए जाने जाते हैं, हमारे ऊपर काल बनकर टूट पडे़। धांय-धांय की आवाज

से भगदड़ मच गयी। एक-एक करके तीन गोलियां मेरे सीने में आ धंसीं, और

उज्ज्वल भविष्य के सपने के साथ मेरी आंखें बन्द हो गयीं। मेरी मौत के बाद भी

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ और सफेद पोशाकें पहने लोगों का हुजूम मेरी मृत

काया के पास आकर ‘सरकार मुर्दाबाद’ तथा ‘किसानों का खून बेकार नहीं

जायेगा’ जैसे नारे लगाने लगा। वहीं पास में भटक रही मेरी आत्मा को समझ

आने लगा कि शायद यही है मेरे खून की कमाई और साथ-साथ यह भी समझ

आ गया कि मेरे ‘खून-पसीने’ की कमाई मेरे लिए नहीं बल्कि उन्हीं के लिए है जो

नारेबाजी कर मेरी मौत पर राजनीति का मजा लूट रहे हैं।

                                                  - कृष्ण कांत वशिष्ठ


   

Sunday, 28 April 2013

एक थी मुनियां...

एक थी मुनियां...


एक थी मुनियां... नाम काल्पनिक लेकिन दर्द की ये कहानी हकीकत है... परिवार की लाड़ली मुनियां घरवालों की सोनचिरैया थी... मां की उम्मीद... पिता का अभिमान और ताऊ की दुलारी थी मुनियां... पढ़ने में बहुत होशियार थी... परिवार को भी मुनियां से ढेरों उम्मीदें थी... आंखों का तारा थी वो...लगता था जैसे-जैसे बड़ी होगी परिवार के सपने साकार करेगी... दुनियां में नाम रोशन करेगी... लेकिन एसा हो न सका... मुनियां के नसीब में सुनहरा भविष्य नहीं बल्कि एक बेरहम मौत लिखी थी... परिवार के सपने मुनियां की काया के साथ मिट्टी में दफन हो गये... बड़ी बेरहमी से मुनियां से उसकी जिंदगी छीन ली गयी... अस्मत के लुटेरों ने उस मासूम के साथ दरिंदगी की सारी हदें तोड़ दीं...उसकी चीखें पास में चल रहे शादी समारोह में बज रहे डीजे की आवाज में दब गयीं... दरिंदों की छत पर ही मुनियां की लाश मिली निर्वस्त्र... निर्जीव... मासूम सा चेहरा ईंट से कुचला हुआ था...  मंजर एसा जो देखे उसकी रूह कांप जाय... मां बेसुध... पिता बदहवास... ताऊ का रो-रोकर बुरा हाल... और ग्रामीण नि:शब्द... परिवार की उम्मीदों की दुनियां, मुनियां के साथ उजड़ गयी लेकिन समाज के सामने सवालों की लम्बी फेहरिस्त छोड़ गयी... क्या मुनियां की कहानी इसी क्लाइमैक्स की हकदार थी ?

मुनियां आबरू बचाने के लिए चिल्लाई तो उसे हमेशा के लिए चुप कर दिया गया... अपने आंगन में चिड़िया सी चहकने वाली मुनियां की देह अनंत खामोशी के साथ जमीन के आगोश में समा गयी... मुनियां एक दिन खबरों की सुर्खियां बनी... दो दिन चर्चा में रही और अब परिवार की सिसकियां ही उसकी साथी हैं... मुनिया भी देश की बिटिया थी... फिर उसके लिए किसी ने एक कैंडिल क्यों नहीं जलायी... क्यों किसी सामाजिक संस्था ने उसके लिए आवाज नही उठायी... क्या मुनियां की मौत इतनी आम थी...फिर क्यों किसी ने उसकी मौत पर शोक नहीं जताया... क्यों किसी को मुनियां में अपनी बेटी नजर नहीं आयी...
काश मुनियां दिल्ली में रह रही होती... तो शायद एक बार फिर संसद में हंगामा होता... नारी अस्मिता की रक्षा के भाषण होते... एक दो सांसद फफक भी  पड़ती... क्या रायसीना हिल्स...क्या इंडिया गेट... क्या जंतर-मंतर... सभी जगह दिन में नारेबाजी और शाम को कैंडिल मार्च होता इतना ही नहीं बॉलीवुड में भी कोई सिसकता... कोई कविता लिखता... सभी एक स्वर में दरिंदों को फांसी की मांग करते... मुनियां की आत्मा की शांति के लिए दुआएं करते... हफ्तों तक मुनियां हर अखबार की हेडलाइन होती... न्यूज चैनलों पर हर रोज दो घंटे का अति महत्वपूर्ण प्राइम-टाइम मुनियां के नाम होता... लेकिन मुनियां के मुकद्दर में तो ये भी नहीं था... वो तो एक छोटे से गांव में पैदा हुई थी और वहीं अपने सपनों को मिट्टी में तड़पता छोड़ गयी...

तीसरे दर्जे में पढ़ती थी मुनियां... हिंदी, अंग्रेजी, प्रारंभिक विज्ञान, इतिहास, सामाजिक विज्ञान सभी का ज्ञान समेट लेना चाहती थी वो... उसकी किताब में गांधी जी नजर आ रहे हैं... लगता है हिंदुस्तान की बेटी की ये हालत देखकर चश्मा उतार कर अभी रो देंगे...आगे सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह की भी तस्वीरें हैं... लगता है उनकी आंखों के शोले दरिंदों की दुनियां जला देने को बेताब हैं... मुनियां की समाधि पर भले ही एक फूल किसी ने न चढ़ाया हो पर चाचा नेहरू को देखकर लगता है कि वे एक गुलाब चढ़ाने जरूर आयेंगे... पर ये भी हकीकत है कि तस्वीरें जिंदा नहीं हो सकतीं... जैसे मुनियां

 
अंतस में मुनियां के दर्द का समंदर समेटे परिवार को अब एक ही उम्मीद है... कि उसके गुनहगारों को एसी सजा मिले कि फिर कोई किसी मुनियां की तरफ एसे देखने की हिम्मत तक न जुटा सके... अभी तो पुलिस के सामने वहशियों को पकड़ने की चुनौती है... अगर समय से गिरफ्तारी हो भी गयी तो... लम्बे समय तक ट्रायल चलेंगे... तारीख दर तारीख समय खिंचता जायेगा... तमाम कानूनी पेचीदगियों के बाद अगर गुनहगारों को सजा-ए-मौत सुना भी दी जाय तो दया याचिका पर फैसला कब होगा कहना मुश्किल... फैसला आ भी जाय तो भी दरिंदों के बचने के तमाम रास्ते... तब तक परिवार के अलावा शायद ही किसी को मुनियां याद रहेगी... फिर समाजसेवा के ठेकेदार मानवता का हवाला देकर सजा माफी की गुहार लगायेंगे... फिर लोग इन दरिंदों के लिए प्रदर्शन करेंगे... और मुनियां... मुनियां का क्या... उसकी समाधि पर हरी-हरी घास उग चुकी होगी जहां समाधि-स्थल भी तलाश पाना नामुमकिन हो जायेगा...


मुनियां हम शर्मिंदा हैं...   
 

Friday, 19 April 2013

मैं दिल्ली हूं...



                                                                मैं दिल्ली हूं...




मैं दिल्ली हूं... लोकतंत्र के सरताज हिदुस्तान का दिल... मैं लोकशाही की जीती-जागती मिसाल हूं... मैं गर्व करती हूं कि मेरे आंगन में लोकतंत्र का मंदिर स्थापित है... मेरे वैभव की कहानी युगों-युगों से गायी जाती रही है... कभी दिल्ली नाम से तो कभी इन्द्रप्रस्थ नाम से... मैं मानव सभ्यता के बदलाव की साक्षात् गवाह हूं...स्थिर रहकर भी मैने हर बदलती हवा का अहसास किया है... मैने अनगिनत दर्द भी सहे हैं लेकिन आज मेरा दर्द असहनीय है... ये दर्द है मेरे दामन पर लगे एसे दाग का जो समय के साथ गहराता जा रहा है... मेरे साये में पल रही अस्मिता आज खतरे में है... महिलायें... युवतियां यहां तक कि मासूम बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं... आज हर कोई मुझे हिकारत भरी नजरों से देख रहा है... एसा नहीं है कि मैं अपनी अस्मिता की रक्षा नहीं कर सकती लेकिन यकीन मानिये आज मैं खुद को असहाय महसूस कर रही हूं... मैं समझ नहीं पा रही कि जिन कंधों पर मेरी इज्जत की रखवाली की जिम्मेदारी है... वे इतने कमजोर क्यों हो गये... क्यों वे आज उन वहशियों की तरफदारी करने लगे जो इंसान कहलाने लायक नहीं हैं... मैं तो उनके बल भरोसे आराम से सो जाती थी लेकिन आज मुझे नींद नहीं आ रही क्योंकि मेरा दागी दामन मेरे अंतस को झकझोर रहा है... मैं परेशान भी हूं और मायूस भी... क्या खाकी क्या खादी सब मेरा विश्वास तोड़ते नजर आ रहे हैं... कोई बयान दे रहा है... कोई कार्रवाई का भरोसा... मैं इनके बयान और आश्वासन पर यकीन कर भी लेती अगर ये पहली बार हुआ होता... मैं आपबीती कहूं भी तो किससे शायद सब गूंगे और बहरे हो चुके हैं ठीक किसी पत्थर की मानिंद... अब मुझे आसरा है तो सिर्फ देश के उन बेटी-बेटों का जिनके लिए मैं आज भी दिल्ली हूं

Thursday, 24 January 2013



लाल सा सूरज निकला था

जब मैं दुनियां में आयी थी।

आसमान भी उजला था

जब मैं दुनियां में आयी थी।


फिजाओं में नये तराने थे

बागों में फूल सुहाने थे

भंवरे भी हुए दीवाने थे

जब मैं दुनियां में आयी थी।


पापा खुश थे बेटी आयी

दुनियां में नाम कमायेगी।

मम्मी खुश थी मेरी बिटिया

मेरा आंगन महकायेगी ।


चाचा खुश थे चाची खुश थीं

ताऊ-ताई हरषाए थे ।

दादी-दादा हुए प्रफुल्लित

जब मैं दुनियां में आयी थी।


कुछ सपने थे मेरे अपने

कुछ अपनों के अरमान भी थे।

उन अरमानों को पूरा करने

मैं इस दुनियां में आयी थी।


कुछ सपने पूरे हुए मगर

कुछ ख्वाब अधूरे छूट गये ।

मेरी अधूरी राहों में

सांसों के धागे टूट गये।

इसमें मेरा कसूर क्या है

उन हैवानों से ही पूछो।

मैं तो उनसे नावाकि़फ थी

जब इस दुनियां में आयी थी।



Monday, 21 January 2013

 
सवा सौ करोड़ सांसें हैं, आवाज एक है

ये मेरा देश है

घरौंदे जुदा-जुदा हैं, बसेरा एक है

ये मेरा देश है

अनगिनत चिराग हैं, उजाला एक है

फूलों से भरे गुलशन का, बागवां एक है

यूं तो जिंदगी में, कई रंग हैं 

पर तिरंगा एक है

ये मेरा देश है

Sunday, 20 January 2013


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