Thursday, 24 January 2013



लाल सा सूरज निकला था

जब मैं दुनियां में आयी थी।

आसमान भी उजला था

जब मैं दुनियां में आयी थी।


फिजाओं में नये तराने थे

बागों में फूल सुहाने थे

भंवरे भी हुए दीवाने थे

जब मैं दुनियां में आयी थी।


पापा खुश थे बेटी आयी

दुनियां में नाम कमायेगी।

मम्मी खुश थी मेरी बिटिया

मेरा आंगन महकायेगी ।


चाचा खुश थे चाची खुश थीं

ताऊ-ताई हरषाए थे ।

दादी-दादा हुए प्रफुल्लित

जब मैं दुनियां में आयी थी।


कुछ सपने थे मेरे अपने

कुछ अपनों के अरमान भी थे।

उन अरमानों को पूरा करने

मैं इस दुनियां में आयी थी।


कुछ सपने पूरे हुए मगर

कुछ ख्वाब अधूरे छूट गये ।

मेरी अधूरी राहों में

सांसों के धागे टूट गये।

इसमें मेरा कसूर क्या है

उन हैवानों से ही पूछो।

मैं तो उनसे नावाकि़फ थी

जब इस दुनियां में आयी थी।



No comments:

Post a Comment