एक थी मुनियां...
एक थी मुनियां... नाम काल्पनिक लेकिन दर्द की ये कहानी हकीकत है... परिवार की
लाड़ली मुनियां घरवालों की ‘सोनचिरैया’ थी... मां की उम्मीद... पिता का अभिमान और ताऊ की दुलारी थी
मुनियां... पढ़ने में बहुत होशियार थी... परिवार को भी मुनियां से ढेरों उम्मीदें
थी... आंखों का तारा थी वो...लगता था जैसे-जैसे बड़ी होगी परिवार के सपने साकार
करेगी... दुनियां में नाम रोशन करेगी... लेकिन एसा हो न सका... मुनियां के नसीब
में सुनहरा भविष्य नहीं बल्कि एक बेरहम मौत लिखी थी... परिवार के सपने मुनियां की
काया के साथ मिट्टी में दफन हो गये... बड़ी बेरहमी से मुनियां से उसकी जिंदगी छीन
ली गयी... अस्मत के लुटेरों ने उस मासूम के साथ दरिंदगी की सारी हदें तोड़ दीं...उसकी
चीखें पास में चल रहे शादी समारोह में बज रहे डीजे की आवाज में दब गयीं... दरिंदों
की छत पर ही मुनियां की लाश मिली निर्वस्त्र... निर्जीव... मासूम सा चेहरा ईंट से
कुचला हुआ था... मंजर एसा जो देखे उसकी
रूह कांप जाय... मां बेसुध... पिता बदहवास... ताऊ का रो-रोकर बुरा हाल... और
ग्रामीण नि:शब्द... परिवार की
उम्मीदों की दुनियां, मुनियां के साथ उजड़ गयी लेकिन समाज के सामने सवालों की लम्बी
फेहरिस्त छोड़ गयी... क्या मुनियां की कहानी इसी क्लाइमैक्स की हकदार थी ?
मुनियां आबरू बचाने के लिए चिल्लाई तो उसे हमेशा के लिए चुप कर दिया गया...
अपने आंगन में चिड़िया सी चहकने वाली मुनियां की देह अनंत खामोशी के साथ जमीन के
आगोश में समा गयी... मुनियां एक दिन खबरों की सुर्खियां बनी... दो दिन चर्चा में
रही और अब परिवार की सिसकियां ही उसकी साथी हैं... मुनिया भी देश की बिटिया थी...
फिर उसके लिए किसी ने एक कैंडिल क्यों नहीं जलायी... क्यों किसी सामाजिक संस्था ने
उसके लिए आवाज नही उठायी... क्या मुनियां की मौत इतनी आम थी...फिर क्यों किसी ने
उसकी मौत पर शोक नहीं जताया... क्यों किसी को मुनियां में अपनी बेटी नजर नहीं आयी...
काश मुनियां दिल्ली में रह रही होती... तो शायद एक बार फिर संसद में हंगामा
होता... नारी अस्मिता की रक्षा के भाषण होते... एक दो सांसद फफक भी पड़ती... क्या रायसीना हिल्स...क्या इंडिया
गेट... क्या जंतर-मंतर... सभी जगह दिन में नारेबाजी और शाम को कैंडिल मार्च होता
इतना ही नहीं बॉलीवुड में भी कोई सिसकता... कोई कविता लिखता... सभी एक स्वर में
दरिंदों को फांसी की मांग करते... मुनियां की आत्मा की शांति के लिए दुआएं करते...
हफ्तों तक मुनियां हर अखबार की हेडलाइन होती... न्यूज चैनलों पर हर रोज दो घंटे का अति महत्वपूर्ण प्राइम-टाइम मुनियां के नाम
होता... लेकिन मुनियां के मुकद्दर में तो ये भी नहीं था... वो तो एक छोटे से गांव में पैदा हुई थी
और वहीं अपने सपनों को मिट्टी में तड़पता छोड़ गयी...
तीसरे दर्जे में पढ़ती थी मुनियां... हिंदी, अंग्रेजी, प्रारंभिक विज्ञान, इतिहास,
सामाजिक विज्ञान सभी का ज्ञान समेट लेना चाहती थी वो... उसकी किताब में गांधी जी नजर
आ रहे हैं... लगता है हिंदुस्तान की बेटी की ये हालत देखकर चश्मा उतार कर अभी रो
देंगे...आगे सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह की भी तस्वीरें हैं... लगता है उनकी
आंखों के शोले दरिंदों की दुनियां जला देने को बेताब हैं... मुनियां की समाधि पर
भले ही एक फूल किसी ने न चढ़ाया हो पर चाचा नेहरू को देखकर लगता है कि वे एक गुलाब
चढ़ाने जरूर आयेंगे... पर ये भी हकीकत है कि तस्वीरें जिंदा नहीं हो सकतीं... जैसे
मुनियां
अंतस में मुनियां के दर्द का समंदर समेटे परिवार को अब एक ही उम्मीद है... कि
उसके गुनहगारों को एसी सजा मिले कि फिर कोई किसी मुनियां की तरफ एसे देखने की
हिम्मत तक न जुटा सके... अभी तो पुलिस के सामने वहशियों को पकड़ने की चुनौती है...
अगर समय से गिरफ्तारी हो भी गयी तो... लम्बे समय तक ट्रायल चलेंगे... तारीख दर
तारीख समय खिंचता जायेगा... तमाम कानूनी पेचीदगियों के बाद अगर गुनहगारों को
सजा-ए-मौत सुना भी दी जाय तो दया याचिका पर फैसला कब होगा कहना मुश्किल... फैसला आ
भी जाय तो भी दरिंदों के बचने के तमाम रास्ते... तब तक परिवार के अलावा शायद ही
किसी को मुनियां याद रहेगी... फिर समाजसेवा के ठेकेदार मानवता का हवाला देकर सजा
माफी की गुहार लगायेंगे... फिर लोग इन दरिंदों के लिए प्रदर्शन करेंगे... और
मुनियां... मुनियां का क्या... उसकी समाधि पर हरी-हरी घास उग चुकी होगी जहां
समाधि-स्थल भी तलाश पाना नामुमकिन हो जायेगा...
मुनियां हम शर्मिंदा हैं...